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30 सालों तक हुए 300 से ज्यादा अध्ययनों के आंकड़ों (मेटा-डाटा) का विश्लेषण करने पर सामने आया कि जीवन में तनावपूर्ण घटनाएं शरीर के इम्यूनिटी सिस्टम पर असर डालती हैं। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में इस मेटा डाटा का विश्लेषण प्रकाशित किया गया हैं।

  1. तनाव का प्रकार और उसकी अवधि तय करती हैं कि यह शरीर पर कितना असर डालेगा। मसलन भीड़ के सामने भाषण देने से पहले भी एक तरह का स्ट्रेस होता हैं, तो कुछ नैसर्गिक तनाव भी होते हैं, जैसे परीक्षा आदि का भय।
  2. फिर आता हैं गंभीर तनाव। ये तनाव बीमारी का भी हो सकता हैं, रिश्ते टूटने का या नौकरी छूट जाने का भय भी। जब लंबे समय तक व्यक्ति को यह लगता हैं कि हालातों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं बचा।
    इसमें उसका अंतःस्त्रावि तंत्र सक्रिय हो जाता हैं यानि कॉर्टिकोसटराइड हॉर्मोन रिलीज होने लगता हैं। दुनियाभर में पाया गया हैं कि तनाव से शरीर की बाकी कार्यप्रणाली पर विपरीत असर पड़ता हैं।
  3. विज्ञान इस बात की पुष्टि पहले ही कर चुका हैं कि तनाव अच्छा नहीं हैं। पर इसमे सकारात्मक सोच का क्या योगदान हैं? शोधकर्ताओं ने इम्यूनिटी का आकलन करने से पहले, लोगों के तनाव का आकलन किया। जो लोग अपनी जिंदगी को तनावपूर्ण मानते हैं और नकारात्मक विचारों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, उनके शरीर में कुदरती मारक सेल्स की संख्या में कमी आती हैं। इन किलर सेल्स का काम वायरस और संक्रमित कोशिकाओं को खत्म करना हैं ।
  4. अध्ययन में देखा गया हैं कि तनाव के प्रति व्यक्ति का नजरिया बहुत हद तक चीजें तय करता हैं। जब लोग थोड़ा कमतर महसूस करते हैं या तनवग्रसित होते हैं, और जब सामूहिक रूप से इकट्ठी करोड़ों सेल्स तैयार होती हैं, इम्यूनिटी सिस्टम भी एक तरफ खड़ा होकर हमारी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा होता हैं।
  5. हर बुरी खबर में कहीं न कहीं अच्छी चीज छुपी होती है। चूंकि सारा तनाव खुद से जुड़ा होता हैं और आपका इम्यूनिटी सिस्टम क्या सुने, इसके लिए आप जिम्मेदार होते हैं। यदि आपके इम्यूनिटी सिस्टम के मॉलिक्यूल्स यानि अणु विचारों के हिसाब से प्रतिक्रिया करते हैं, तो ये हम पर निर्भर करता हैं कि हम उसे किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। अच्छा महसूस करने पर शरीर भी अच्छी प्रतिक्रिया करता है। वक़्त हैं कि हम खुद से बात करें और सकारात्मक सोच के साथ इम्यूनिटी सिस्टम को मजबूत बनाएं।