कुचामन शहर के नगरसेठ (आराध्य देव) भगवान श्री गणेश जो कि शहर के उत्तर पूर्वी भाग में अरावली पर्वतमाला की एक पहाड़ी पर सिद्धि विनायक स्वरूप में विराजमान हैं।
डूंगरी (छोटी पहाड़ी) पर होने से इसे आस-पास में “गणेश डूंगरी” के नाम से जाना जाता हैं।
सैकड़ों वर्ष पुराने इस मंदिर की एक खास विशेषता यह हैं कि यहाँ बीते 126 वर्षों तक पूजा-अर्चना का कार्य महिला पुजारी द्वारा किया जाता था।
प्रदेश में संभवतः किसी गणेश मंदिर में यह इकलौता ही उदाहरण होगा।
किसी महिला द्वारा पूजा का काम संभालना उस दौर में बहुत बड़ी बात थी, जब हमारा समाज पर्दा-प्रथा जैसी रूढ़ियों से जकड़ा हुआ था।
अठारहवीं शताब्दी में कुचामन ठिकाने द्वारा गणेश डूंगरी का निर्माण करवाया गया था।
जिसमें भगवान गणेश रिद्धि-सिद्धि के साथ सिद्धिविनायक स्वरूप में विराजित किए गए।

गणेश डूंगरी का इतिहास

यह मंदिर शहर के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं।
मंदिर निर्माण के उपरांत मंदिर की देख-रेख व पूजा-अर्चना का जिम्मा ठिकाने की ओर से ब्राह्मण परिवार को सौंपा गया।
किन्तु इस परिवार के मुखिया के असामयिक निधन के पश्चात परिवार की आर्थिक स्थिति बेपटरी हो गई।
सन् 1891 में परिवार की डाली देवी ने पति के निधन के बाद तत्कालीन राजा से अपने परिवार की आजीविका चलाने के लिए मंदिर की पूजा-अर्चना की अनुमति मांगी।
राजा ने सलाह मशविरा के बाद उन्हें पूजा की अनुमति दे दी।
हालाँकि, डाली देवी के लिए यह आसान नहीं था क्योंकि उस समय समाज में पर्दा-प्रथा समेत कई कुरीतियाँ व्याप्त थी।
लेकिन उन्होंने चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया।
इसके बाद उनके परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी महिलाओं ने ही प्रधान पुजारी की जिम्मेदारी संभाली।