भोग नंदीश्वर मंदिर – चिकबलापुरा (कर्नाटक)

भगवान शिव को समर्पित यह अद्भुत मंदिर कर्नाटक राज्य के चिकबलापुरा (बैंगलोर) में नंदी की पहाड़ियों पर स्थित है।
9वीं शताब्दी में बना यह मंदिर कर्नाटक राज्य के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है।
इसका निर्माण नोलाम्बा के शासक द्वारा करवाया गया था।
बाद में बाना, गंगा, चोला व विजयवाड़ा आदि राजवंशों ने इसके निर्माण को आगे बढ़ाया।

बनावट

यह मंदिर नंदी की पहाड़ियों पर एक शांत स्थल पर स्थित है।
यह मंदिर चारों ओर से पाँच पहाड़ियों ब्रम्हागिरी, विष्णुगिरी, स्कंदगिरी, दिव्यगिरी व नंदी दूर्गा से घिरा हुआ हैं।
इस मंदिर को शुरू में दो भागों में विभाजित करके बनाया गया था जो भगवान शिव के जीवनकाल को दर्शाते है।
इसका निर्माण द्रविड़ शैली में किया गया है।

मंदिर के भाग

इसमें पहला भाग अरुणाचलश्वेर है जो मंदिर के उत्तरी भाग में स्थित है।
यह भाग भगवान शिव के बचपन के काल को दर्शाता है जिन्हें दिखाने के लिए विभिन्न चित्र और भित्तियां दीवारों पर बनायीं गयी है।
दूसरे भाग का नाम भोगा नंदीश्वर मंदिर हैं जो मंदिर के दक्षिणी भाग में स्थित मुख्य स्थल है।
यह स्थल भगवान शिव के यौवन काल को दर्शाता है।
इसके बाद विजयवाड़ा के राजाओं द्वारा 12वीं शताब्दी में दोनों भागों के बीच एक तीसरे भाग का निर्माण करवाया गया जिसे उमा महेश्वर नाम दिया गया।
यह भाग भगवान शिव के माता पार्वती से विवाह को दर्शाता है।
इस भाग में दीवारों पर शिव पार्वती, ब्रह्मा सरस्वती, विष्णु लक्ष्मी के भी कई चित्र मिलेंगे।
इसी पहाड़ी पर मंदिर के ऊपर इसी मंदिर का एक और भाग स्थित है जिसे योग नंदीश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है।
यह भगवान शिव के परित्याग, मोहभंग, सांसारिक वस्तुओं से लगाव ना होना इत्यादि को दर्शाता है।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर आकर्षक भित्ति स्तंभ, विभिन्न आकारों व चित्रों से खुदी हुई खिड़कियाँ हैं।
मंदिर परिसर में दो मुख्य शिखर हैं जिनके बीच शिवलिंग के साथ नंदी विराजमान है।
यहाँ के मुख्य स्तंभ काले पत्थरों से निर्मित किये गए है जिस पर अनेक कलाकृतियाँ करके उस समय की कथाओं को दर्शाया गया है।
जैसे कि नृत्य करते हुए शिव, भैंसे के सिर पर खड़ी माँ दुर्गा की भित्तियां इत्यादि।
हर मंदिर में एक गर्भगृह है जहाँ पर शिवलिंग विराजमान है व बाहर की ओर नंदी शिवलिंग की ओर मुख किये हुए है तथा माँ पार्वती भी विराजमानहैं।
इन सबके साथ इस मंदिर के अंदर एक विशाल पानी का कुंड भी है जिसे शृंगेरी तीर्थ के नाम से जाना जाता है।
इसमें पानी पिनाकिरी नदी से रहस्यमयी तरीके से आता है।

विशेष

प्राचीन सभ्यता में बने उत्कृष्ट कला का उदाहरण यह मंदिर जिसे पहाड़ियों के बीच बनाया गया है।
अब यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत आता है जो इसकी देखभाल करता है।
नवविवाहित जोड़ों के बीच यह मंदिर बहुत प्रसिद्ध हैं।
यहाँ कई नए शादीशुदा जोड़े भगवान शिव व माता पार्वती का आशीर्वाद लेने आते है।
यहाँ पर प्रमुख त्यौहारों व आयोजनों पर दीये जलाकर रोशनी की जाती है व उत्सव का आयोजन किया जाता है।

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