रानी की वाव – पाटन (गुजरात)

अपनी अनूठी वास्तुशैली के लिए विश्व भर में मशहूर विशाल “रानी की वाव” गुजरात के पाटन शहर में स्थित है। इस भव्य बावड़ी का निर्माण सोलंकी वंश के शासक भीमदेव की पत्नी उदयमति ने 10वीं-11वीं सदी में अपने स्वर्गवासी पति की स्मृति में करवाया था। करीब 1022 से 1063 के बीच इस 7 मंजिला बावड़ी का निर्माण किया गया था। सोलंकी राजवंश के शासक भीमदेव ने वडनगर (गुजरात) पर 1021 से 1063 ईस्वी तक शासन किया था। अहमदाबाद से करीब 140 किलोमीटर की दूरी पर बनी यह ऐतिहासिक धरोहर “रानी की वाव” प्रेम का प्रतीक मानी जाती है।
ऐसा माना जाता है कि इस अनोखी बावड़ी के निर्माण पानी का उचित प्रबंध करने के लिए किया गया था, क्योंकि इस क्षेत्र में वर्षा बेहद कम होती थी, जबकि कुछ लोककथाओं के मुताबिक रानी उदयमती ने जरूरतमंद लोगों को पानी प्रदान कर पुण्य कमाने के उद्देश्य से इस विशाल बावड़ी का निर्माण करवाया था।
सरस्वती नदी के तट पर स्थित यह विशाल सीढ़ीनुमा आकार की बावड़ी कई सालों तक इस नदीं में आने वाली बाढ़ की वजह से धीमे-धीमे मिट्टी और कीचड़ के मलबे में दब गई थी, जिसके बाद करीब 80 के दशक में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस जगह की खुदाई की। काफी खुदाई करने के बाद यह बावड़ी पूरी दुनिया के सामने आई। और अच्छी बात यह रही कि सालों तक मलबे में दबने के बाद भी रानी की वाव की मूर्तियां, शिल्पकारी काफी अच्छी स्थिति में पाए गए।
यह वास्तुकला का एक अनुपम उदाहरण है। इस बावड़ी का निर्माण मारू-गुर्जर स्थापत्य शैली का इस्तेमाल कर किया गया है। इस जल संग्रह प्रणाली के इस नायाब नमूने को इस तरह बनाया गया है कि यह जल संग्रह की उचित तकनीक, बारीकियों और अनुपातों की अत्यंत सुंदर कला क्षमता की जटिलता को बेहतरीन ढंग से प्रदर्शित करती हैं।
सीढ़ियों वाली इस भव्य बावड़ी की पूरी संरचना भू-स्तर के नीचे बसी हुई है, जिसकी लंबाई करीब 64 मीटर, चौड़ाई करीब 20 मीटर है, जबकि यह 27 मीटर गहरी है। यह अपने समय की सबसे प्राचीनतम और अद्भुत स्मारकों में से एक है। इस बावड़ी की दीवारों पर बेहतरीन शिल्पकारी और सुंदर मूर्तियों की नक्काशी की गई है।
इसके साथ ही इस विशाल बावड़ी की सीढ़ियों पर बनी उत्कृष्ट आकृतियां यहां आने वाले सैलानियों का मन मोह लेती हैं। अपने प्रवेश द्वार से लेकर अपनी गहराई तक यह अनूठी बावड़ी पूरी तरह से उत्कृष्ट शिल्पकारी से सुसज्जित है। इस विशाल बावड़ी की अद्भुत संरचना और अद्वितीय शिल्पकारी अपने आप में अनूठी है।
सीढ़ियों वाली सात मंजिलीं इस अनूठी बावड़ी की दीवारों पर सुंदर मूर्तियां और कलाकृतियों की अद्भुत नक्काशी की गई है। इस अनूठी बावड़ी में 500 से ज्यादा बड़ी मूर्तियां हैं, जबकि 1 हजार से ज्यादा छोटी मूर्तियां हैं। औधें मंदिर के रुप में डिजाइन की गई इस बावड़ी में भगवान विष्णु के दशावतारों की मूर्तियां बेहद आकर्षक तरीके से उकेरी गईं हैं।
इस बावड़ी के सबसे अंतिम स्तर पर एक गहरा कुआं है, जिसे ऊपर से भी देखा जा सकता है। इस कुएं के अंदर गहराई तक जाने के लिए सीढ़ियां निर्मित की गई हैं, लेकिन अगर इसे ऊपर से नीचे की तरफ देखते हैं तो यह दीवारों से बाहर निकले हुए कुछ कोष्ठ की तरह नजर आते हैं, जिनका पहले कभी किसी तरह की वस्तु आदि रखने के लिए उपयोग किया जाता था।
इस अनूठी बावड़ी की सबसे खास बात यह है कि इस वाव के गहरे कुएं में अंदर तक जाने पर शेष-शैय्या पर लेटे हुए भगवान विष्णु की अद्भुत मूर्ति देखने को मिलती है, जिसे देखकर यहां आने वाले पर्यटक अभिभूत हो जाते हैं एवं इसे धार्मिक आस्था से भी जोड़कर देखा जाता है।
यहां विष्णु भगवान के नर्सिंह, वामन, राम, वराह, कृष्ण समेत अन्य प्रमुख अवतार की कलाकृतियां उकेरी गईं हैं। इसके अलावा इस विशाल बावड़ी में माता लक्ष्मी, पार्वती, भगवान गणेश, ब्रह्रा, कुबेर, भैरव और सूर्य समेत तमाम देवी-देवताओं की कलाकृति भी देखने को मिलती है।
इसके अलावा इस भव्य बावड़ी पर भारतीय महिला के 16 शृंगारों को परंपरागत तरीके से बेहद शानदार ढंग से दर्शाया गया है। यहीं नहीं इस बावड़ी के अंदर कुछ नागकन्याओं की भी अद्भुत प्रतिमाएं देखने को मिलती है।
सात मंजिला इस ऐतिहासिक और विशाल बावड़ी को इसकी अनूठी शिल्पकारी, अद्भुत बनावट एवं इसकी भव्यता के साथ भूमिगत जल के उपयोग एवं बेहतरीन जल प्रबंधन कि व्यवस्था के चलते साल 2018 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया है। तथा साल 2018 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 100 रुपए के नोट पर छापी गई इस ऐतिहासिक ‘रानी की वाव’ में हर स्तर पर स्तंभों से बना हुआ एक गलियारा है, जो कि वहां के दोनों तरफ की दीवारों को जोड़ता है।

Leave Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *