नीलकंठेश्वर मंदिर, उदयपुर (मध्यप्रदेश)

नीलकंठेश्वर शिव मंदिर मध्यप्रदेश स्थित विदिशा जिले के गंजबासौदा तहसील के उदयपुर ग्राम में स्थित है। मंदिर का निर्माण परमार राजा उदयादित्य द्वारा कराया गया था। मंदिर संवत् 1116 में प्रारंभ हुआ था और संवत् 1137 में निर्माण पूर्ण हुआ था और संवत 1137 में में शिखर पर ध्वजारोहण किया गया था, जिसका उल्लेख शिलालेख में है।
यह मंदिर प्रदेश के विश्व विख्यात खजुराहो मंदिर की श्रेणी में आता है। मंदिर का नक्शा हर खंड पर अंकित है। पत्थरों पर तराशे गए इन छोटे-छोटे खंडों को जोड़कर मंदिर का गर्भगृह बनाया गया है। गुंबद के नीचे लगे हर खंड में मंदिर का पूरा नक्शा अंकित दिखाई देता है। इससे सहज ही अंदाजा लग जाता है कि मंदिर जमीन से कितना ऊपर और कितना नीचे है। मंदिर लाल बलुआ पत्थर से भूमिज शैली में निर्मित है और मंदिर के चारों ओर पत्थर की दीवार बनाई गई है। मंदिर में प्रवेश के चार द्वार थे लेकिन वर्तमान में प्रवेश के लिये केवल एक द्वार उपलब्ध है। विशाल पत्थर से निर्मित जगती (पत्थर से निर्मित चबूतरा) पर मंदिर का निर्माण किया गया है। मुख्य मंदिर व अन्य मंदिर जगती पर बने हुये है और सम्पूर्ण मंदिर निर्माण स्थल पत्थर की दीवार से चारों ओर से घिरा हुआ है। मुख्य मंदिर मध्य में स्थित है और उसके चारों प्रत्येक कोने पर छोटे मंदिर का निर्माण किया गया था, और छोटे मंदिरों के मध्य में भी यज्ञशाला जैसे धार्मिक स्थलों का निर्माण किया गया था। वर्तमान में सभी छोटे मंदिर मूल स्वरूप में उपलब्ध नहीं है केवल उनके भग्नावेश उपलब्ध है। मंदिर का निर्माण खजुराहो के मंदिरों के निर्माण से समरूप और पंचायत शैली के समरूप है। मंदिर के शिखर पर एक मानव मूर्ति निर्मित है। आर्य शैली के शिखर मंदिरों में उपरोक्त मंदिर महत्वपूर्ण है। मुख्य मंदिर के पृष्ठ भाग पर निर्मित छोटे मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया है। जो वर्तमान में मंदिर प्रांगण में उपलब्ध है।
मुख्य मंदिर मध्य में निर्मित किया गया है और उसमें प्रवेश के तीन द्वार है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है जिसमें सिर्फ शिवरात्रि के दिन ही उगते हुए सूरज की किरणें पड़ती है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग का आकार लगभग 8 फुट का है जिस पर पीतल का आवरण चढ़ा हुआ है जो कि केवल शिवरात्रि के दिन ही उतारा जाता है। वर्तमान में भगवान शिव की पूजा अर्चना मंदिर पर की जाती है। शिवलिंग का निर्माण भोपाल के पास स्थित भोजपुर शिव मंदिर में स्थित शिवलिंग के समरूप है।मंदिर के बाह्य दीवाल पर विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ पाषाण पर उत्कीर्ण की गई है, अधिकांश मूर्तियाँ भगवान शिव के विभिन्न रूपों से सुसज्जित है महत्वपूर्ण मूर्ति शिल्प में स्त्रीगणेश, भगवान शिव की नृत्यरत नटराज मूर्ति, महषासुर मर्दिनी, कार्तिकेय आदि की मूर्तियाँ है और इसके अतिरिक्त स्त्री सौन्दर्य को प्रदर्शित करती कई अन्य मूर्तियाँ भी है।
नीलकंठ महादेव मंदिर में गर्भगृह से बाहर स्तंभों पर खजुराहो की तरह कामसूत्र का चित्रण किया गया हैं। मध्यकाल में लोग बड़ी संख्या में वैराग्य की ओर आकर्षित हो रहे थे। उस समय देवालयों के माध्यम से उन्हें गृहस्थ जीवन की ओर आकर्षित करने का प्रयास जारी था।
हिजरी 737 और 739 के दो शिलालेखों में मुहम्मद तुगलक के काल में और हिजरी 856 में इस्लामशाह सूरी के शासनकाल में मसूखाँ द्वारा और हिजरी 894 के शिलालेख में मांडू के मुहम्मद शाह खिलजी के समय में मस्जिद का निर्माण किये जाने का उल्लेख है। मुख्य नीलकंठेश्वर मंदिर की बाह्य दीवारों पर उत्कीर्ण देवी देवताओं के वास्तुशिल्प मुस्लिम शासन के शासकों के समय के दौरान तोड़ा गया है जिसके अवशेष वर्तमान में मंदिर प्रांगण में उपलब्ध है।
यहाँ हर वर्ष महाशिवरात्रि पर पांच दिवसीय विशाल मेले का आयोजन भी किया जाता है इस पवन अवसर पर लाखों भक्त शिव जी के दर्शन करने आते हैं और धर्म लाभ लेते हैं।

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